मंगलवार, 22 मई 2007

तुम्हे देखा

.
.
तुम्हे देखा तभी सोचा
बहोत कुछ पा लिया मैने
तुम्हे अपना बनाऊंगा
इरादा झट किया मैने

जो मेरा था लडकपन से
जो मेरा रह नही पाया
जो इतने दिन सम्हाला था
तुम्हे दिल दे दिया मैने

तुषार जोशी, नागपुर

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना है। कोई अपनी मरजी नही चलती ,जब दिल का मामला हो-
    "जिस दिल पे कभी हमको इतना गुरूर था
    वो सामने से गुजरे,हम दिल तलाश में"

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह गीत याद आ गया...!

    "भंवरे की गुंजन है मेरा दिल,
    कब से संभाले रखा है दिल...
    तेरे लिए....तेरे लिए..."

    उत्तर देंहटाएं
  3. :)

    प्रेम... बस प्रेम है... इसका एहसास आनन्दमयी है, बहुत सुन्दर!

    उत्तर देंहटाएं
  4. Namaste Tusharjee,
    Apaki sabhi kavitaen padhi. Bahoot acchi lagi. Apaki kavitaen vachako ke liye prerana denevala ek bahoot badhiya madhyam hai.
    Apake lekahni ko jeevan ke har roop ko savarne ki kala ko acchi tarah gyat hai.
    Apaki agali kaivta ke prtikasha me .Jalda use yaha par prakashit kare.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खुबसूरत पंक्तिया है ये,क्योंकि ये पंक्तिया दिल से निकली खूबसूरती को दर्शाती है
    जिसका कोमल दिल मानवता और इंसानियत को पहचानती है ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. शुक्रिया! आप सभी ने टिप्पणी लिखकर जो हौसला बढाया है वो प्रेरणादायी है।

    उत्तर देंहटाएं