गुरुवार, 17 मई 2007

तुम्हारी हाँ


doddano kaaji..., originally uploaded by ahskad.

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तुम्हारी हाँ अंगुठी बन
के उंगली मे समा गई है
चिढ़ाना सारे मित्रों का
ठीठोली मुझको भा गई है

मुझे रोमांच देता है
मुझे वो सब लगे प्यारा
जहाँ से जिक्र तुम्हारा और
तुम्हारी याद आ गई है

तुषार जोशी, नागपुर

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह... पहले अंगुठी, फ़िर सात फ़ेरे... और फ़िर तो फ़ेरे ही फ़ेरे या हेराफ़ेरी... हा हा
    मगर ये मोतीचूर का लड्डू खाओ तो पछताओ, ना खाओ तो पछताओ.... खाना ही ठीक है..

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  2. वाह तुषार भाई,
    भाव प्रधान कविता…!!!

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  3. वाह तुषार भाई मै तो आपको सिर्फ़ गीतकार ही समझती थी,..मगर..मियाँ क्या बात आप तो गज़ब के शायर निकले...
    बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति..
    ढेर सारी बधाईयाँ,..
    सुनीता(शानू)

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  4. tushar ji aapki kavitayen padhker bus itna hi kehoongi aaj waapes se college jane ko man ker reha hai ,itrane ko man ker reha hai khud ko aaine main dekhne ko man ker reha hai,kuch naya mehsoos kerne ko man ker reha hai.
    ye jo aapki god gift hai prabhu kere isme din duni raat choguni wardhi ho.
    I mean it
    shukriya nehi kehoongi aapki poem ke aage bahut pheeka leg reha hai but every day main dheere se aaker aapswe aapki kavitaayen choora ker le jaoongi unhe jeene ke liye, unke sukhad ahessas main dubne ke liye jiske liye aap bhi mujhe nehi rok sakte
    bye god bless u

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