मंगलवार, 1 मई 2007

भयकंपित


Aishwarya23, originally uploaded by Tilak Haria.

भयकंपित हो
जब तुमने
दरवाजा खोला था
रबड था बुद्धू
साँप नही जो
हाथ में डोला था

मगर तुम्हारी
सूरत देखी
पछताया फिर मैं
तुम रूठी तो
जियूँगा कैसे
घबराया फिर मैं

देखो दोनों
हाथों से मै
कान पकडता हूँ
माफ करो
मत रूठों मुझसे
नाक रगडता हूँ

तुषार जोशी, नागपुर

3 टिप्‍पणियां:

  1. aapaka शब्द चित्र achha lagaa.
    tushaar jee..chitron ne
    kaavya ke svaroop ko
    aur bhee nikhaar diya hai.
    aabhaar
    sasneh
    gita

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  2. आपकी पंक्तियों ने चित्र की सुन्दरता बढ़ा दी है, बहुत ही सुन्दर रचते है आप, मानों चित्र नहीं साक्षात वार्ता कर रहें हो।

    बधाई!

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  3. khupach saral sadhi pan sachchi vatate hi kavita mala....

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