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शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

तुम्हारी याद

(छायाचित्र सहयोग: रिधिमा)
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तुम्हारी याद जब भी आती है
जड़ से हिलाती है
महकाकर जाती है

तुम्हारी हँसीं की खनखनाहट
यूँ रोम रोम में अंकित होती है
जैसे याद में नहीं
सच में ही तुम फिर से आ गए हो

तुम्हारी छवी आँखों में
इस तरह डेरा डाल बैठी हैं
लगता है अभी हाथ बढाकर
सहला लूँ तुम्हारे बालों को

बस इक याद में भी
हरदम महसूस होते हो
लगता है धीरे से हाथों को
छू लिया है तुमने
मै कितनी ही देर तक
हाथों को तकता रहता हूँ

उफ तुम्हारी याद जब भी आती है
जड़ से हिलाती है
महका कर जाती है मुझको

तुषार जोशी, नागपूर
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सोमवार, 1 अगस्त 2011

आज अचानक

(छायाचित्र सहयोग: रिधिमा कोटेचा)
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नाचूँ गाउँ धूम मचाउँ खुश हूँ मैं ईतना
आज अचानक सच हो गया मेरा ईक सपना

पकड पकड के सब लोगों को बात बताउँ मैँ
उमड रही खुशी ईतनी चिखूँ चिल्लाउँ मैँ
हँसी बनी है आज सुबह से होठों का गहना
आज अचानक सच हो गया मेरा ईक सपना

आज ना रोको गा लेने दो धून में अपनी ही
ईंतजार का फल मिठा है मान गए हम भी
आज किसी से हमें रही शिकायत कोई ना
आज अचानक सच हो गया मेरा ईक सपना

तुषार जोशी, नागपूर
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रविवार, 31 जुलाई 2011

किमत

(छायाचित्र सहयोग: रिधिमा कोटेचा)
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आपकी अदाएँ मौसम को
उँगलीयों पर नचाती है
आप जो भी पहन लेते हो
उसकी किमत बढ जाती है

काला लाल हरा जामुनी
सब आपके गुलाम है यहाँ
आपने पहना  ईसी बात से
उनकी कलीयाँ खिल जाती है

सहजता से हँसीं उदासी
कैसे पहन लेती है आप
चाहें कोई भी अदा हो
बस दिवाना कर जाती है

तुषार जोशी, नागपूर
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